Thursday, 30 January 2014

एक ओस की बूँद पड़ जाती है चेहरे पर

अपने गमो को,
अपनी चिन्ताओ को
अपनी बुरी भावनाओ को
अपनी सीलन भरी मानसिकता को

कल धुप जरूर लगवा लेना
कुछ तपिश में सुलग कर
कुछ उस की तरंगो से
उमड़ आएगी खुशियन 

तेरे झुलसे हुए चेहरे पे
कुछ लकीरे जो गम से ढकी थी
खत्म हो जाएँगी धुप में
फिर मुस्कराहट ही
नजर आएगी

खिल जायेगा तेरा चेहरा
जैसे बसंत के आने पर
मन प्रफुलित हो जाता है
एक ओस की बूँद
पड़ जाती है चेहरे पर !!!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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