तुम्हारी खामोश निगाहों को पढने
की मुझे आदत सी हो गयी है
तुम चुप इतना हो की अंधेरो
को सहमने की आदत सी हो गयी है !!
न खामोश रहा करो इतना की
उजाला न बरस सके सामने
तुम को अपने अंदर गम छिपाने
की आदत सी हो गयी है !!
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
की मुझे आदत सी हो गयी है
तुम चुप इतना हो की अंधेरो
को सहमने की आदत सी हो गयी है !!
न खामोश रहा करो इतना की
उजाला न बरस सके सामने
तुम को अपने अंदर गम छिपाने
की आदत सी हो गयी है !!
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
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