Friday, 3 January 2014

तेरे लिए दिल रोता है मेरे कान्हा

जब से देखा है   तेरा गोकुल धाम
मोरा दिल रोता है सुबह और शाम
कैसी लीला दिखा दी तूने मेरे कान्हा
में  तो  हो  गया  हूँ  अब  बेनाम !!

कैसा अभागा हूँ मैं दुनिया में
तेरे साथ को तरसता रहता हूँ
जिन्दगी की शाम ढल रही है
दे दे दर्शन अब आकार मेरे श्याम !!

कौन सा अपराध हो गया है जो
मैं भटकता रहता हूँ राहों में,तेरे
दर पर आकर बैठा हूँ कब से ,नहीं
करने देता कोई तेरा दर्शन मेरे श्याम !!

इस गरीब के खाते में कुछ नहीं
है तुझे भेंट चढ़ाने को मेरे कान्हा
दो बूँद आंसू की लेकर आया हूँ
बस तेरे चरणों  में भेंट चढ़ने को !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ





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