कल तक थी यह राहें अपनी
आज बेगानी सी क्यों लगती हैं
कल गुजरा था यहाँ से करवा मेरा
सब में नादानी सी क्यों लगती है ??
खुशियन थी इतनी की समां
नहीं पाती थी दामन में मेरे
आज वो कहाँ है. खो गयी
कुछ बेमानी सी क्यों लगती है ??
इंसान ने अपना धर्म भुला दिया
यह फिजां अब अनजानी सी लगती है
कुदरत ने दिया था सलीका सबको
यह घटा अनजानी सी क्यों लगती है ??
रहम नाम की चीज नहीं बिकती अब यहाँ
कुछ न कुछ अनजानी सी तो बात है
इज्जत, दया, भाव, समर्पण सब खो चुका है
अब यह पुराणी सी "अजीत" तुझे क्यों लगती है ??
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
आज बेगानी सी क्यों लगती हैं
कल गुजरा था यहाँ से करवा मेरा
सब में नादानी सी क्यों लगती है ??
खुशियन थी इतनी की समां
नहीं पाती थी दामन में मेरे
आज वो कहाँ है. खो गयी
कुछ बेमानी सी क्यों लगती है ??
इंसान ने अपना धर्म भुला दिया
यह फिजां अब अनजानी सी लगती है
कुदरत ने दिया था सलीका सबको
यह घटा अनजानी सी क्यों लगती है ??
रहम नाम की चीज नहीं बिकती अब यहाँ
कुछ न कुछ अनजानी सी तो बात है
इज्जत, दया, भाव, समर्पण सब खो चुका है
अब यह पुराणी सी "अजीत" तुझे क्यों लगती है ??
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
No comments:
Post a Comment