Saturday, 25 January 2014

मेरी आत्मा भटकती है, खोई खोई

मन में तू,
जिगर में तून
मेरी सांसो में तून
मेरी धड़कन में तून
बस तून ही तून
तेरे सिवा न ओर कोई
न दिन का चैन
न रात का आराम
तूने मेरी सुध बुध खोई
न रहा कहीं का
न रुकने का जी कहीं

तून है बड़ा परोपकारी
मेरे बांसुरी वाले
तूने ऐसी ललक लगाई
तेरे दर्शन को बिना
न दिल लगता कहीं
जैसे मेरी आत्मा
भटकती है, खोई खोई

राधे राधे
अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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