Tuesday, 3 December 2013

अपने को समझ बैठे यह ये "मालिक "

उन मालिको के लिए, यह कविता पेश कर रहा हूँ, जो केवल अपना अपना ही सोचते हैं, किसी और से उनको कोई मतलब नहीं है, वो मालिक बनकर यह समझते हैं जैसे उनके सब गुलाम हैं, किसी के घर में क्या गुजरती है,उनको कोई सम्बन्ध नहीं, अपनी मस्ती में वो इतनी मस्त हैं, बस परेशां तब होते हैं, जब उनके दिल पर वो सब गुजरता है, जो आम व्यक्ति रोजाना अपने ऊपर गुजरता हुआ सहन करता है, और फिर भी अपने काम को अंजाम देता है......वाह रे कलियुग के मालिको

बना कर महल, तुमने कर्मचारिओं के खून पसीने से
मौज रोजाना करते, दिखाई देते हो कसीनो में
रफ्ता रफ्ता जिदगी रोजाना रोंदते नजर आते हो
क्यूं खून सूखता जा रहा है, तुम लोगो के सीनो में !!

अपना दुःख तुमको सदा दिखाई देता है,और हम को सुनाई देता है
क्या तुम्हारे काम करने वालो का दुःख, तुमको नहीं दिखाई देता है
दूसरों के जज्बातों कि कोई कद्र नहीं है, तुम्हारे दिल और सीनों में
क्यूं दिल तुम्हारा दुखता नहीं, देखकर उनके दुखों को हर महीनो में !!

खून पसीना बहा बहा कर , रुखी सुखी खा पीकर कर,दिन गुजर जाता है
तुम को उन सब का खून निचोड़ निचोड़ कर पीने में बहुत मजा आता है
माना कि तुम मालिक हो उस के, भगवान् से बढ़कर तो नहीं हो सकते
तुम्हारी मंशा ऐसी होनी चाहिए, कि तुम उस के लिए सब कुछ हो कर सकते !!

नियत तुम्हारी बड़ी कमजोर है, शक कि सीमा का तुम पर पूरा जोर है
चमचों के बलबूते, करते हो रोजाना काम, फिर भी अंदर से कमजोर हैं
किसी सरकारी दफ्तर के एक फरमान से, उड़ जाते तुम्हारे होश हैं
मैने दुनिया में तुम जैसों को, बहुत पास से देखा तुम्हे बेहोश होते हुए !!

तुम पैसे से ईमारत , महल, शोहरत ,गहनों से सजे घूमते रहते हो,
बेईमानी की दौलत से अपने सपनो का संसार बनाये घूमते हो
उस का अंजाम तुम्हारी बिमारिओं के द्वारा नजर आ ही जाता है
हम तो अपने , प्रभु को सच्चे मन से याद, कर चैन कि नींद सोते हैं !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ


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