बहुत दिन पहले हमारे अटल बिहारी वाजपई साहब ने कहा था, कि भारतीय लोग किसी भी जगह पर "थूक" देते हैं.. उन्होने बिलकुल सही कहा था...और उनकी इसी "थूक" पर में यह कविता लिख रहा हूँ.
****************************""थूक""****************************
न जाने तू कहाँ से चली आती है
आते आते मुख को गन्दा कर जाती है
रोकने से भी न रूकती है तून
बस हो या कार पिक से निकल जाती है !!
कोई घर से साफ़ सुथरा निकल के आया
तून उस पर बे खौफ भाग पड जाती है
क्या तुझ को नहीं लगता ऐसा कर के
तून लोगो को लोगो से ही लडवाती है!!
क्या बिगाड़ा है तेरा दीवारों ने तून झट
पट उन के रंग खराब कर जाती है
इस महंगाई के दौर में तुझे पता है
कई साल में रंग रौगन कि जाती है !!
दफ्तर हो या सडक तुझे न आती लज्जा है
बस तुझ को अपना अपना दिखाई देता है
किस पर क्या गुजरती है,यह वो जाने
तुझे अपनी करनी पर नहीं आती लज्जा है !!
अब तो तेरा स्टायल बदल गया है,
तूं आती सुन्दरता को साथ लेकर
पान हो या गुटखा तेरे नए नए बने है
यह यार जिन को आती साथ लेकर !!
तुझ को भाते हैं यह सब, क्यों कि तून फ्री है
तेरा न होता कोई खर्चा ,क्यों कि तून फ्री हे
"अजीत" ड्राइक्लीन के पैसा इतनी महंगे हैं
एक "थूक"का दाग मिटने में जिदगी गुजर जाती है !!
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
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न जाने तू कहाँ से चली आती है
आते आते मुख को गन्दा कर जाती है
रोकने से भी न रूकती है तून
बस हो या कार पिक से निकल जाती है !!
कोई घर से साफ़ सुथरा निकल के आया
तून उस पर बे खौफ भाग पड जाती है
क्या तुझ को नहीं लगता ऐसा कर के
तून लोगो को लोगो से ही लडवाती है!!
क्या बिगाड़ा है तेरा दीवारों ने तून झट
पट उन के रंग खराब कर जाती है
इस महंगाई के दौर में तुझे पता है
कई साल में रंग रौगन कि जाती है !!
दफ्तर हो या सडक तुझे न आती लज्जा है
बस तुझ को अपना अपना दिखाई देता है
किस पर क्या गुजरती है,यह वो जाने
तुझे अपनी करनी पर नहीं आती लज्जा है !!
अब तो तेरा स्टायल बदल गया है,
तूं आती सुन्दरता को साथ लेकर
पान हो या गुटखा तेरे नए नए बने है
यह यार जिन को आती साथ लेकर !!
तुझ को भाते हैं यह सब, क्यों कि तून फ्री है
तेरा न होता कोई खर्चा ,क्यों कि तून फ्री हे
"अजीत" ड्राइक्लीन के पैसा इतनी महंगे हैं
एक "थूक"का दाग मिटने में जिदगी गुजर जाती है !!
अजीत कुमार तलवार
मेरठ




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