Tuesday, 10 December 2013

तुमको दिल में सजा के रख लूँगा

बिजली कि चमक देखि है
तेरे इन नैनों में मैने उस दिन
जब में अपने शब्दों को तलाश 
रहा था लिखने को अंधेरो में !!

हकीकत बन कर तुम आ गई
सामने मेरे उस दिन
जिस दिन अपनी उलझनों
को संवर रहा था अंधेरे में !!

सुलझा दिया तुमने मेरा
बिगड़ता हुआ वो कल का सपना
यह जान कर खुश हुआ दिल
चलो यह सपना तो है अपना !!

ख्वाब तो रोजाना में देखा करता हूँ
कोई तो हो जो जाने मुझे अपना
यह चन्द लम्हें साथ गुजार लूं
ताकि कोई तो कहने वाला हो अपना !!

यादो कि बारात संजो कर रख लूँगा
तेरे ख्वाबो को में अपना बना के रख लूँगा
दुनिया का क्या है वो तो कहती रहेगी
तेरी हर बात को दिल में सजा केरख लूँगा !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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