Thursday, 13 February 2014

ताकती रहती हूँ राह तेरी

मैं आते जाते
ताकती रहती हूँ राह तेरी
दिन रात रह रहकर
आती रहती है याद तेरी

यह लम्हा बना दुःख देता है
जब तक नहीं दिखती सूरत तेरी
आ जा इक झलक दिखला जा
बुझे दिल को, मिलेगी सौगात , 

वो तेरी

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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