Tuesday, 4 February 2014

वो प्यार बनके आजा

तून बन के ख्वाब आजा
मेरा सरताज बन के आजा
में ढूँढता हो सरे राह तुझ को
तून मेरी एक आह पर तो आजा !!

हर नजर, हर वक्त , तेरी याद में
गुजर कर चला जाता है
में पकड़ना भी चाहूं उसको, वो
दगा दे कर भाग जाता है !!

इक सहारा है मेरे पास तेरी
यादो का , वो पिटारा मेरे साथ
साथ ही रह जाता है
मेरी जिन्दगी का बस इक तून
ही है सरोकार, ओ मेरे सरताज
बस तून, वो प्यार बनके आजा !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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