Wednesday, 5 February 2014

जिन्दगी में न कभी ऐसा पहले हुआ

एक चित्रण, मेरे जन्म दिन का सुबह से शाम तक

परसों अपने जन्म दिन पर एक 
ऐसा तोहफा मिला
न भुलाया जा सकता है ऐसा
वो एक समां मिला

जिन्दगी में न कभी
ऐसा पहले हुआ
जो मिला ऐसा मिला
दिल पर अपनी
दस्तक का एक पहरा हुआ

सारे अरमान यूं ही रह गए
घर पर सारे प्रबन्ध यूं ही रह गए
जब तक घर पहुंचे
अगले दिन के अरमान जाग गए

बचों ने न जाने क्या क्या सोचा था उस दिन
मेरे पहुँचने के घर पर सब पहले हो सो गए
एक मायूस सी छवि लेकर जब बिस्तर पर आया
अब अगले बरस की इन्तेजार में हम भी सो गए

बिटिया ने मेरी केक मंगवा कर रखा था
में देर से आया तो उस का चेहरा उतरा था
बोली पापा आज तो कम से कम जल्दी आते
देखो, अब आप कैसे हो, क्यों देर से आते ??

क्या बताये उस मासूम को की नौकरी क्या चीज है
प्राइवेट और सरकारी यही तेरे पापा की तक़दीर है
बॉस को तो अपना अपना लगता सब कुछ अच्छा है
मेरे बच्चे पर क्या गुजरी, वो कहाँ उस को लगता है !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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