नजर नजर का क्या कसूर
यह नजर है ही ऐसी चीज
जब झुकती है, तो खुद उठती है
जब उठती है, तब खुद चलती है
मैंने लाख संभाला इसको की
रुक जा न भाग , रुक जा
पर कहन यह रूकती है
यह इस को पता
मैने सोचा की अब रुकी
पर कहाँ यह तो बहुत दूर
तलक जा निकली
में नहीं रोक सका इसको
यह भागी और भागी
मेरी खुद की नजर
से दूर, की न रुकी
अब क्या हूँ,
की है किस का कसूर
नजर का या..उसका
जिस के पीछे
यह भागी
दूर और दूर......
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
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