Thursday, 20 February 2014

इक महल बनाते हैं, सपनो का

आ चल, इक महल बनाते हैं, सपनो का
न ईंट , न सीमेंट, न बदरपुर, न सरिया
बस सपनो में रहना , बाहर न जाना
बाहर चला गया तो, पीछे पड़ जाएगी दुनिया !!

मन कितना आजाद होगा, न कोई पहरा होगा
वो सितारों सा आसमान, घर कितना न्यारा होगा
न चिक चिक , न कोई किसी परकार का झंझट
बस सपना वो सब से ज्यादा , सुनहरा ही होगा !!

मिलने आ जाना, जब दिल करे तेरा मिलने का
मिल बैठ कर वो सारी बातें, तू सुना जाना वहां
कम से कम दुनिया तो न होगी वहां पर ,अपने सिवा
कुछ कह जाना, और कुछ सुन जाना , आकर वहां !!

अरमानो का मखमल सा सुंदर वो बिस्तर होगा
किसी राजा की शयन कक्ष से , क्या वो कहीं कम होगा
सकूं से रात गुजर जाएगी, बस वो सपना मेरा होगा
देखना तून जरूर, वो समय निकल, आ जाना वहां !!

अजीत तलवार
मेरठ

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