@@@@@@ भिखारी का सफ़र @@@@@@
दर दर ठोकर खाता जाता एक
लंगड़ा सा, और अँधा सा भिखारी
एक डंडे के सहारे, सहमा सहमा सा
किस से मांगू, किस से न मांगू
पर मांगना थी उस की लाचारी !!
न घर था उस का न कोई था ठिकाना
पर समझते थे लोग शायद है
यह इस कोई नया बहाना
लाचार था अपनी मजबूरी से वो
पल पल गुजरती हुई दूरी से वो
पास से गुजरती हुई गाडिया
ठेस पहुंचा जाती थी, और बेचारे
को सब से मिल रही थी गलिया !!
हे राम, क्यूं मुझ को बनाया तूने
अँधा और लंगड़ा भी कर दिया
रहम की भीख मांग मांग कर
तूने बड़ा गन्दा यह कर दिया
कोई समझता की में जान कर करता हूँ
किस को बताऊँ की यह में क्यूं करता हूँ !!
घर पर है अंधी माँ, और लंगड़ी बीवी
जिस की खातिर में दर दर भटकता हूँ !!
मर्द हूँ, न घर से निकलना उस की थी मजबूरी
न जाने अंधी को देख कर क्या हो जाये मजबूरी
वो घर कब आएगी यह कैसे बता पाता उन सबको
खुद ठोकर खा लूँगा, पर इज्जत तो रहीगी बची मेरी !!
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
दर दर ठोकर खाता जाता एक
लंगड़ा सा, और अँधा सा भिखारी
एक डंडे के सहारे, सहमा सहमा सा
किस से मांगू, किस से न मांगू
पर मांगना थी उस की लाचारी !!
न घर था उस का न कोई था ठिकाना
पर समझते थे लोग शायद है
यह इस कोई नया बहाना
लाचार था अपनी मजबूरी से वो
पल पल गुजरती हुई दूरी से वो
पास से गुजरती हुई गाडिया
ठेस पहुंचा जाती थी, और बेचारे
को सब से मिल रही थी गलिया !!
हे राम, क्यूं मुझ को बनाया तूने
अँधा और लंगड़ा भी कर दिया
रहम की भीख मांग मांग कर
तूने बड़ा गन्दा यह कर दिया
कोई समझता की में जान कर करता हूँ
किस को बताऊँ की यह में क्यूं करता हूँ !!
घर पर है अंधी माँ, और लंगड़ी बीवी
जिस की खातिर में दर दर भटकता हूँ !!
मर्द हूँ, न घर से निकलना उस की थी मजबूरी
न जाने अंधी को देख कर क्या हो जाये मजबूरी
वो घर कब आएगी यह कैसे बता पाता उन सबको
खुद ठोकर खा लूँगा, पर इज्जत तो रहीगी बची मेरी !!
अजीत कुमार तलवार
मेरठ
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