Saturday, 1 February 2014

अगले आने वाले सालों में ज्यादातर

पागलों को ढूँढने की जरूरत नहीं है
सरे राह मिल जाते हैं हजारों
लगता है जैसे शेहर में अब इनकी
बारात निकले ही वाली है 

जिस को देखो, खुद हँसता
खुद रोता, खुद बातें 
करता नजर आ ही जाता है
यह खुदा जाने ??

पर हम को तो बेचारा
प्यार में पागल, दीवाना,
लाचार, बनता हुआ ही
नजर आता है !!

कभी रो कर गुजारिश करता है
कभी हंस कर खिलखिला जाता है
बस एक रोग ऐसा लग गया है
उसको, की वो पागल नजर आता है !!

चाहे, टाटा, चाहे रिलायंस, चाहे
आईडिया, ही वो चला रहा हो
मोबाइल, लैपटॉप, का अब वो
बहुत बीमार नजर आता है !!

नहीं इस का इलाज दुनिया में
डॉक्टर भी हार जायेंगे
कहाँ से लायें इस रोग की दवा
सब से पहले जाकर वो कब्र से
धीरू भाई अम्बानी को पास बुलाएँगे !!

क्या रोग लगा गया...भाई,
ऐसा तो नहीं सोचा था ?
हर घर में अगले आने वाले
सालों में ज्यादातर , पागल और
बीमार ही नजर आयेंगे ???

अजीत कुमार तलवार "करूणाकर"
मेरठ

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