Tuesday, 26 November 2013

जो दिल को न छु सकी

जो दिल को न छु सकी में वो कविता लिखना नहीं चाहता
जो दिल को सकूं न दे सकी में वो बात कहना नहीं चाहता
आज फेस बुक पर दिल जोडने को बेताब हैं ना जाने कितने
चेहरे, पर कुछ में जो गलत बात है, में कहना नहीं चाहता !!

अपने दिल से पूछ कर देखो कि क्या बात किसी के दिल को
नश्तर कि तरह चुभ कर दर्द हजारों दे जाती है,
में तो रोजाना इस मुकाम पर पहुंचा हूँ मेरे मिलने वालो
बात ऐसी न कहो,जो खुद को पसंद न हो,खुद को गवारा न हो !!

अजीत "करुणाकर"
मेरठ

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