Tuesday, 26 November 2013

दामिनी तेरी पीड़ा सही न जाये

दामिनी की मौत के बाद उसकी माँ के ह्रदय की पीड़ा कुछ इस तरह अभिव्यक्त हुई होगी .............

सूरज की पहली किरण सी थी तुम 
सुंदर ओस की एक बूंद सी थी तुम 

परियों सी तुम मेरे दर आई थी 
सुहानी धूप बन कर छाई थी

चिड़ियाँ सी चहचहाती फिरती थी
घरभर में खिलखिलाती फिरती थी

स्वरों में झरनों का छिपा था निनाद
सुन के मन को होता था आह्लाद

उदासी में तुम एक हंसी की दवा थी
मन में तेरी खुशहाली की दुआ थी

मेरे रुदन में तुम हाथों का रुमाल थी
दिनभर घर में करती तुम धमाल थी

क्रोध का मेरे सिर्फ तुम ही ताला थी
मेरे गम में तुम ही एक मधुशाला थी

वह घडिया कितनी निर्मम रही होगी
जब तुम घर से बाहर निकली होंगी

तुम्हें मेने उस दिन टोक दिया होता
घर से निकलने से रोक लिया होता

कैसे वो कष्ट तुमने झेला होगा
वो मानव नहीं दानव ही रहा होगा

दुष्टों को दंड मिलेगा जिस दिन
माँ का दिल धीर धरेगा उस दिन

तुम बिन लगता ये जग अब सुना है
हो गया मेरा दुःख अब तो दूना है

तुम बिन नहीं कटता पल-पल है
प्राण निकलने को अब बेकल है 

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