Monday, 21 April 2014

दिन भर घूमती हैं लाशे इस शेहर में

दिन भर घूमती हैं लाशे इस शेहर में
कुछ साँसों को अपने साथ लेकर
बड़ा बेबस है इन्सान का नजारा
अपनी ही लाश ढो रहा अपने कंधे पर !!

कुछ संभलता सा , कुछ गिरता सा 
कुछ डगमगा रहा मैखाने पर
संभालना तो चाहता है, पर 
नहीं संभलता है, मैखाने पर !!

अपनी कशमकश में उठा रहा है
सारी आशाओं का पिटारा कंधे पर
मर मिटता नजर आता है इक ख्वाब
की खातिर बस उस इक नजर पर !!

अजीत तलवार
मेरठ

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