दिन भर घूमती हैं लाशे इस शेहर में
कुछ साँसों को अपने साथ लेकर
बड़ा बेबस है इन्सान का नजारा
अपनी ही लाश ढो रहा अपने कंधे पर !!
कुछ संभलता सा , कुछ गिरता सा
कुछ डगमगा रहा मैखाने पर
संभालना तो चाहता है, पर
नहीं संभलता है, मैखाने पर !!
अपनी कशमकश में उठा रहा है
सारी आशाओं का पिटारा कंधे पर
मर मिटता नजर आता है इक ख्वाब
की खातिर बस उस इक नजर पर !!
अजीत तलवार
मेरठ
कुछ साँसों को अपने साथ लेकर
बड़ा बेबस है इन्सान का नजारा
अपनी ही लाश ढो रहा अपने कंधे पर !!
कुछ संभलता सा , कुछ गिरता सा
कुछ डगमगा रहा मैखाने पर
संभालना तो चाहता है, पर
नहीं संभलता है, मैखाने पर !!
अपनी कशमकश में उठा रहा है
सारी आशाओं का पिटारा कंधे पर
मर मिटता नजर आता है इक ख्वाब
की खातिर बस उस इक नजर पर !!
अजीत तलवार
मेरठ
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