*******मेरा एक छोटा सा व्यंग********
खुद को समर्पित करते हुए ??
खुद को समर्पित करते हुए ??
सींच कर एक नन्हा
सा पौधा , मेरी कल्पना
में विराजमान हो गया
में उस पर अपना
हक़ जताने के लिए
खुद मेहरबान हो गया
वो मासूम सा, सोच
में पड़ गया, की यह
आज खाद पानी
देकर, मुझ
पर मेहरबान हो गया
क्या इस ने पैदा किया
मुझ को जो मेरी
सारी खुशिओं
का यह तलबगार हो गया
उस ने ली अंगडाई
और वो मुरझाने लग
गया
मैने सोचा, की अब
इस का दिन नजदीक
है आने लगा
छोड़ के में उस को
किसी और पर जाकर
हक़
अपना जताने लगा
पर वो समझा मेरी
फितरत और वो भी
अपने स्वाभाव में
बल खाने लगा
और मुझ को याद
आई अपनी,तरफ
झाँका मैने
और बोला मन से
सा पौधा , मेरी कल्पना
में विराजमान हो गया
में उस पर अपना
हक़ जताने के लिए
खुद मेहरबान हो गया
वो मासूम सा, सोच
में पड़ गया, की यह
आज खाद पानी
देकर, मुझ
पर मेहरबान हो गया
क्या इस ने पैदा किया
मुझ को जो मेरी
सारी खुशिओं
का यह तलबगार हो गया
उस ने ली अंगडाई
और वो मुरझाने लग
गया
मैने सोचा, की अब
इस का दिन नजदीक
है आने लगा
छोड़ के में उस को
किसी और पर जाकर
हक़
अपना जताने लगा
पर वो समझा मेरी
फितरत और वो भी
अपने स्वाभाव में
बल खाने लगा
और मुझ को याद
आई अपनी,तरफ
झाँका मैने
और बोला मन से
सब्र रख उतना की जितना दिया है ऊपर वाले ने
उस पर क्यूं हक़ जताता है यहाँ तू इस ज़माने में
रहने दे उस को अपनी छोटी सी खुशिओं के साथ
न परेशां कर आ आकर तूं अपने किसी बहाने से !!~
उस पर क्यूं हक़ जताता है यहाँ तू इस ज़माने में
रहने दे उस को अपनी छोटी सी खुशिओं के साथ
न परेशां कर आ आकर तूं अपने किसी बहाने से !!~
अजीत

No comments:
Post a Comment